बाली उमर: उपन्यास समीक्षा

“बाली उमर” उपन्यास एक गांव के बच्चों की ऐसी कहानी है जो इस कहानी के कालखंड में शायद उत्तर भारत के हर गांव के बच्चों की कहानी का प्रतिनिधित्व करती है। उपन्यास गांव के बच्चों के एक समूह के कार्य कलापों के द्वारा बच्चों के किशोर बनने की एक प्रक्रिया को दर्शाने के साथ साथ वहाँ की तत्कालीन समाजिक परिस्थितियों को भी चित्रित करने के उद्देश्य में सफल जान पड़ता है।

इस उपन्यास के चार चरित्र पोस्टमैन, खबरीलाल, गदहा और आशिक हर उस व्यक्ति को अपनी स्मृतियों से जोड़ते हैं जो किसी गाँव या छोटे क़स्बे में पले बढ़े हैं और या तो हम स्वयं को या अपने किसी दोस्त या परिचित को कहानी के इन मुख्य चार पात्रों से कहीं ना कहीं जुड़ा पाते हैं। उपन्यास की कहानी बाली उमर के इन बच्चों की उत्सुकता और शैतानियों से शुरू होती है किंतु धीरे धीरे मानवीय संवेदना और भावनात्मकता कहानी को “पागल है” को मुखिया के जाल से छुड़ा कर वापस उसके राज्य कर्नाटक भेजने के गंभीर विषय की ओर किस कलात्मकता से मोड़ देती है यह लेखक के रचनात्मक कौशल को भली भाँति दर्शता है।

“बम्बईया” का चरित्र कहानी में एक विशेष महत्व रखता है जो एक अतिथि चरित्र की भूमिका में दिखता है, वह बहुत कम समय में ही कहानी के एक चरित्र “पागल है” जिसकी शुरुआत में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं दिखती है उसका जिस प्रकार चार प्रमुख चरित्रों के साथ संवाद स्थापित करा उसे कहानी के मुख्य चरित्र में परिवर्तित कर देता है वो घटना बहुत रोचक है और उपन्यास में एक “टर्निंग पॉइंट” का काम करती है। इस प्रकार उपन्यास मानव संबंधों में संवाद की महत्वपूर्ण भूमिका को एक बार फिर से रेखांकित करता है।

“पागल है” का चरित्र कहानी में एक बहुत मजबूत चरित्र बन कर उभरता है और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संघर्षरत रहने की प्रेरणा देने के साथ साथ उन्हीं परिस्तिथियों में जीवन को जी लेने का अवसर ना छोड़ने की सीख भी देने का प्रयास करता दिखाई पड़ता है। बाकी चरित्र भी अपनी भूमिका के साथ बराबर न्याय करते दिखते हैं।

शहरी परिवेश में पले बढ़े पाठकों के लिए यह उपन्यास तत्कालीन ग्रामीण परिवेश को समझने और बच्चों व किशोरों के जीवन को जानने के लिए एक महत्वपूर्ण व संग्रहनीय पुस्तक है, शुरूवात में चरित्रों और परिवेश को समझने में कुछ समय लग सकता है किंतु धीरे धीरे उपन्यास पाठक को अपने साथ बांधता चला जाता है। “दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे”, बड़े “मियां, छोटे मियां”, लाहौर बस सेवा, क्रिकेट मैच, राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर, भुज के भूकंप आदि का संदर्भ उपन्यास को पठनीय बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

– सचिन देव शर्मा

 

नोट : समीक्षा हिन्दीनामा में प्रकाशित हो चुकी है।

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