ये लाल टिब्बा क्या है ?

उत्तरांचल पत्रिका के जुलाई 2019 अंक में प्रकाशित मसूरी से सटे लंढौर कस्बे के प्रसिद्ध लाल टिब्बा का यात्रावृत्तान्त: ये लाल टिब्बा क्या है ?

एक दिन पहले ही मसूरी पहुँचे थे। सुबह तैयार होकर होटेल से निकले। टैक्सी स्टैंड पास ही था, वहाँ से दिन भर घूमने के लिए टैक्सी ले ली। टैक्सी में बैठते हुए मैंने ड्राइवर से पूछा की पहले कहाँ चलना है वो बोला “साहब, पहले लाल टिब्बा चलेंगे“। इतना सुनते ही बिटिया ने तपाक से पूछा “पापा, ये लाल टिब्बा क्या है?“। मैं थोड़ा होम वर्क करके घर से चला था। मैंने उसे बताया “ याद है ना कल गन हिल गए थे“ उसने हाँ में गर्दन को हिलाया, मैंने कहा “बस यही समझ लो कि उससे भी ऊँची पहाड़ी है“। शायद उसे समझ आ गया था। मसूरी और लंढौर दोनों को मिलाकर देखा जाए तो सबसे ऊँची चोटी है लाल टिब्बा, लगभग 7500 फीट की ऊंचाई पर है समुद्र तल से। अब मैंने दूसरा सवाल ड्राइवर पर दाग दिया “तीनों टूरिस्ट स्पॉट एक ही दिशा में हैं क्या?“ मेरा मतलब था लाल टिब्बा, शेडअप कियोपलिंग टेम्पल (बुद्धा टेम्पल) और कंपनी गार्डन। उसने जवाब दिया “नहीं साहब “ लाल टिब्बा एक तरफ है और बुद्धा टेम्पल और कंपनी गार्डन दूसरी तरफ, पहले लाल टिब्बा देख लें साहब फिर बुद्धा टेम्पल और कंपनी गार्डन के लिए वापस लाइब्रेरी चौक से ही होकर जाना पड़ेगा“।

लाइब्रेरी चौक से लगभग आठ किलोमीटर था लाल टिब्बा, वहाँ से देहरादून की ओर जाने वाला रास्ता पकड़ा, कल दिल्ली से आते हुए जो नज़ारे छूट गए थे, मैं उन्हीं को पकड़ने की कोशिश कर रहा था और टैक्सी ड्राइवर अपनी ही धुन में मस्त होकर गाड़ी को दौड़ाए चला जा रहा था। कुछ किलोमीटर आगे बाएँ ओर घुमावदार मोड़ पर ऊपर की ओर चढ़ने लगे। जिस घुमावदार मोड़ से ऊपर की ओर चढ़े थे वहाँ लगे बड़े से हरे रंग के साइन बोर्ड पर लिखा था देहरादून पैतीस किलोमीटर, कैम्पटी फॉल अठारह किलोमीटर, किताब घर मतलब लाइब्रेरी तीन किलोमीटर। “तीन किलोमीटर“, मैंने अपने आप से पूछा लेकिन हम तो अभी लाइब्रेरी चौक से काफी आगे निकल आए हैं , शायद वो मेरा भ्रम था क्योंकि अगर साइन बोर्ड पर लिखा है तो ठीक ही लिखा होगा। वह सड़क करीब एक किलोमीटर आगे जाकर मॉल रोड के दूसरे छोर पर ही जा मिली थी और लाइब्रेरी चौक से मॉल रोड के उस छोर की दूरी करीब दो किलोमीटर थी। मॉल रोड के उस दूसरे छोर पर से लाल टिब्बा जाने वाली सड़क के शुरू में ही बाएं हाथ पर यूनियन चर्च दिखाई पड़ी, यूनियन चर्च जाना मेरी लिस्ट में था लेकिन मुझे ये अंदाज़ा नहीं था की चर्च बीच में ही पड़ेगी, अगर पता होता तो शायद पहले ही टैक्सी वाले से बात कर लेता, अभी कहते हुए कुछ हिचखिचाहट हो रही थी मन सोच रहा था “अरे भैया, खुद ही रोक कर दिखा दे“, पर वो तो हम प्रोफेशनल्स से भी ज़्यादा प्रोफेशनल निकला। क्या मज़ाल जो उस तरफ़ मुड़ कर देख भी ले। अब जो है ठीक है सोचते हुऐ आगे बढ़ गये, गाड़ी जिस सड़क पर चल रही थी वो सड़क सकरी होती जा रही थी। डर यह था की कहीं सामने से अगर कोई गाड़ी आ गई तो यहीं फंसे रह जायेंगे लेकिन खुशकिस्मती ये थी की अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ था। हम एक पहाड़ी बस्ती से निकलते हुए जा रहे थे। क्या नहीं था वहाँ पर,मेरा मतलब है कि सभी कुछ तो था मकान, दुकान, चर्च, मंदिर, होटेल, पार्किंग और न जाने क्या क्या, उसी रास्ते पर एक जगह सड़क के बाएं ओर बनी दीवार पर मुंबई की मशहूर वर्ली पेंटिंग जैसा भी कुछ था, कुछ और आगे जाने पर सड़क कुछ चौड़ी हो गयी थी, दूर से दिखती एक रंग बिरंगी ईमारत, शायद वो एक मंदिर था। अब आगे जाने पर सड़क की चौड़ाई में तो कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ा था लेकिन बस्ती खत्म सी होती जा रही थी । धीरे-धीरे आगे का रास्ता सकरा होता जा रहा था और लाल टिब्बा तक पहुँचते-पहुँचते इतना सकरा हो गया की एक मोड़ पर हम से आगे जाती हुई कार और लाल टिब्बा की ओर से आती कार को साथ साथ निकलने का रास्ता न था जैसे तैसे गाड़ियों का आगे पीछे करके गाड़ियाँ निकलीं। वहाँ से आगे निकले ही थे कि कार की खिड़की से ही सही लेकिन लंढौर की प्रसिद्ध चार दुकान को देखने का मौका मिला, ये दुकानें चाय नाश्ते की आम दुकानें हैं जहाँ आने-जाने वाले सैलानी रुक कर चाय नाश्ते का मज़ा उठाते हैं। वहाँ से निकल कर पाँच मिनट में ही ड्राइवर ने गाड़ी लाल टिब्बा पर रोक दी और बोला “घूम आइये साहब, मैं यहीं इंतज़ार करता हूँ “। “क्या-क्या है यहाँ ?“ गाड़ी से निकलते-निकलते मैंने ड्राइवर से पूछा, उसने एक लाल रंग की इमारत की और इशारा करते हुये कहा कि ईमारत के ऊपर बड़े बड़े दूरबीन लगे हैं दूर की पहाड़ियों को देखने के लिए। उसने गाड़ी लगभग उस ईमारत के पास में ही रोकी थी, कैफ़े भी था उस लाल ईमारत में। उस लाल ईमारत के सामने सफ़ेद रंग की एक ईमारत और भी थी। मैं समझने में लगा था की इधर जायें की उधर, इतने में ही उस सफ़ेद ईमारत के नीचे बनी दुकान से निकलते लड़के ने कहा “सर, ऊपर चले जाइये, पचास रुपये में छह पॉइंट्स दिखाते हैं। इससे पहले कि मैं सोच पाता की किधर जाऊँ, श्रीमती जी की आवाज़ कानों में पड़ी “अरे यहीं चलो ना , क्या फर्क पड़ता है, बोल तो रहा है कि बाईनोकुलर्स लगे हैं“। “तो चलो“ मैंने कहा “हमें नहीं जाना, तुम ही देखो“। बिटिया साथ में आना चाहती थी और ऊपर तक आई भी लेकिन ऊपर बैठे पालतू कुत्ते को देखकर वापस नीचे जाने की ज़िद कर बैठी, फिर उसे नीचे छोड़ना पड़ा। ऊपर और भी लोग थे जो दूर की चोटियों को देखना चाहते थे। जीन्स और जैकेट पहने, रॉबिनहुड जैसी कैप लगाए हुए एक सज्जन एक-एक करके सभी लोगों को हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला पर स्थित चोटियों के दर्शन करा रहे थे। शायद गाइड थे, अच्छे पढ़े-लिखे मालूम पड़ते थे, अंग्रेजी भी बोल रहे थे।

मैं अपनी बारी का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। मेरे से पहले वाले पर्यटक उस गाइड से शिवालिक की उन चोटियों के बारें में बहुत ज्यादा पूछताछ कर रहे थे, ज़रूरत से कुछ ज्यादा ही समय लगा रहे थे, मन ही मन उस सैलानी को यह सोचते हुए कोस रहा था कि पचास रुपये में उस दूरबीन वाले गाइड की जान ही ले लोगे क्या? ज्यों ही अपना नम्बर आया फटाफट दूरबीन से चिपक लिए। शिवालिक की दूध से नहाई उन चोटियों की ओर दूरबीन को सेट करते हुए उसने सीधे हाथ की ओर दो ऐसी चोटियाँ जिनमें एक बड़ी और एक छोटी दिख रही थी, की ओर इशारा करते हुए कहा कि ये बद्रीनाथ और केदारनाथ की चोटियाँ हैं, बाएं ओर की एक और बड़ी छोटी का परिचय उसने नीलकंठ के रूप में दिया और उसके एक बराबर वाली चोटी का नाम स्वर्गरोहिनी बताया। एक गाँव और गन हिल का दीदार भी कराया। एक दिन पहले जब गन हिल गए थे तक वहाँ से लाल टिब्बा भी इसी तरह दिखाया गया था। केदारनाथ और बद्रीनाथ को लाल टिब्बा से देख पाना अपने आप में बहुत रोमांचक था, ऐसा लगता था कि मानो हम वहीं पहुँच गये हो। आस पास का दृश्य बहुत ही मनोरम था। एक तरफ दूर से ही आँखों को सन्न कर देने वाली शिवालिक की बर्फीली छटा वहीं दूसरी और उस सर्द माहौल में गढ़वाल की पहाड़ियों को सेकती वो सोने सी चमचमाती धूप। मज़ा तो था घूमने का वहाँ। फटाफट उसे पचास रुपये थमाये और तड़ातड़ सीढ़ियों से उतरते हुए नीचे आ पहुँचा।
नीचे आया तो मैडम व्यंगपूर्ण अंदाज़ में बोली “इतना जल्दी क्यों आ गए, आराम से आते“। हालाँकि समय ज़्यादा नहीं हुआ था फिर भी चुप रहने में ही भलाई थी। मैंने कहा “अच्छा चलो बाकी क्या है वो भी देख लेते हैं“ लेकिन जो दूरबीन से देखा था वहाँ से भी वही दिख रहा था बस फर्क था तो यही की जो दूरबीन से साफ चमकता था वो यहाँ से छोटा और धुंधला। लोग ऐसी जगह जाते हैं प्राकर्तिक सुंदरता को निहारने लेकिन वहाँ पर भी लोग अपनी दुकानदारी चमकाने का रास्ता ढूंढ ही लेते हैं सो वहाँ पर भी गुब्बारे पर निशाने लगाने का स्टॉल मिल ही गया, ये स्टॉल उस सफ़ेद ईमारत से बाहर निकल कर दाएँ हाथ पर था, उसी तरफ थोड़ा आगे जाने पर वो रास्ता दो रास्तों में बंट रहा था एक रास्ता सीधा जा रहा था और एक नीचे की तरफ जाती सीढ़ियों में बदल गया था। सीढ़ी से नीचे जाना संभव न था क्योंकि वहाँ पर लगा लोहे का गेट एक सजग प्रहरी की तरह किसी को भी नीचे जाने से रोक रहा था ,शायद उस तरफ जाना सुरक्षित भी नहीं था। उस गेट और सीधी जाती सड़क के बीच में बनी ढाई-तीन फीट की दीवार दूर तक जाती नज़र आती थी। लाल टिब्बा का वो हिस्सा बहुत ही हरा भरा और शांत दिख रहा था, वो हरा -भरा और शाँत वातावरण हमें वहाँ दो पल बिताने के लिए मज़बूर कर रहा था और क्यों न करे इसी मकसद से तो घूमने फ़िरने निकले थे। उसी दीवार पर कुछ देर बैठ कर प्रकर्ति के साथ एक होने का प्रयास करते हुए उस सुकून को महसूस करना ध्यान लगाने से कमतर महसूस नहीं हो रहा था, लेकिन कितनी देर तक यूँ ही बैठे रह सकते थे लाल टिब्बा पर बनी उस छोटी सी दीवार पर। फोटो के रूप में उस जगह बिताए पलों को कैमरे में कैद किया और निकल पड़े अगले पड़ाव की ओर। पार्किंग में हमारा इंतज़ार कर रहा ड्राइवर गाड़ी में बैठा-बैठा ऊँघ रहा था, अलकसता हुआ उठा, शायद कहना चाहता था कि भाई खुद ही घूम लो मुझे सोने दो।

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